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पंच पर्व

1. धनतेरस / धन त्रयोदशी /यम दीपम

कार्तिक मास की त्रयोदशी को धनतेरस कहते हैं।  पंच पर्वों या महोत्सव की शुरुआत धनतेरस से होती है। इसी दिन समुद्र मंथन से धन्वंतरि जी प्रकट हुए थे तब उनके हाथों में अमृत से भरा हुआ कलश था। इसीलिए इस दिन बर्तन खरीदने की परम्परा है। धन्वंतरि जी चिकित्सा के देवता भी है इसलिए अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी इनकी पूजा की जाती है और यदि उस बर्तन में रोगी जल पीए तो बहुत जल्दी स्वस्थ हो जाता है।

यम दीपम : इसी दिन शाम को घर के बाहर मुख्य द्वार पर दीपक जलाने की प्रथा है। ये दीपक परिवार में किसी की आकस्मिक मृत्यु न हो और परिवार की रक्षा के लिए घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर जलाया जाता है।

इसी दिन लक्ष्मी जी के साथ कुबेर यंत्र भी स्थापित करना चाहिए।

शुक्रवार- धनतेरस मुहूर्त

शाम- 5 बजकर 34 मिनट से 6 बजकर 01 मिनट तक

प्रदोष काल: 5.28 शाम से- 8 बजकर 07 मिनट

वृषभ काल: 5.24 शाम से- 7.29 तक

त्रयोदशी तिथि- 12 नवंबर 21.30 रात्रि से प्रारंभ 13 नवंबर 5.59 शाम को समाप्त

2. दूसरे दिन को नरक चतुर्दशी/रूप चौदस/काली चौदस/छोटी दिवाली

इसी दिन कृष्ण जी ने नरकासुर का वध करके भगवान श्रीकृष्ण ने 16,100 कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कराया।  

अभय दान स्नान-इस दिन सूर्योदय से पूर्व स्त्रियां अगर उबटन से स्नान करने से रूप व सौंदर्य में वृद्धि होती है।( तिल का तेल उबटन में मिलाएँ) ।

मुहूर्त- 5.23 सुबह से 6.43 तक

चतुर्दशी- 13 नवंबर 5.59 शाम से 14 नवंबर 2.17 दोपहर तक

3. दिवाली/लक्ष्मी पूजन

दिवाली वाले दिन लक्ष्मी जी का जन्मदिन होता है इसलिए इस लक्ष्मी पूजन होता है। दिवाली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है।

अमावस्या तिथि - 14 नवंबर 2.17 से प्रारम्भ- 10.36 सुबह 15 नवंबर समाप्त

लक्ष्मी पूजन मुहूर्त- 5.30 शाम से 7.25 रात तक

प्रदोष काल- 5.27 शाम से 8.06 रात

वृषभ काल- शाम 5.30 से 7.25 तक

4. गोवर्धन पूजन/ अन्नकूट -कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है।

इस दिन को लेकर मान्यता है कि त्रेतायुग में जब इन्द्रदेव ने गोकुलवासियों से नाराज होकर मूसलधार बारिश शुरू कर दी थी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर गांववासियों को गोवर्धन की छांव में सुरक्षित किया। तभी से इस दिन गोवर्धन पूजन की परंपरा भी चली आ रही है।

5 .भैया दूज- इस दिन को भाई दूज और यम द्वितीया कहते हैं। भाई दूज, पांच दिवसीय दीपावली महापर्व का अंतिम दिन होता है। भाई दूज का पर्व भाई-बहन के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने और भाई की लंबी उम्र के लिए मनाया जाता है। रक्षाबंधन के दिन भाई अपनी बहन को अपने घर बुलाता है जबकि भाई दूज पर बहन अपने भाई को अपने घर बुलाकर उसे तिलक कर भोजन कराती है और उसकी लंबी उम्र की कामना करती है।